फणीश्वरनाथ रेणु का इतिहास विवेक :साधारण व्यक्ति और समाज की स्वाधीनता का प्रश्न

 

-डॉ. प्रकाशचंद भट्ट

 

          र्ष दोहज़ार इक्कीस की चार मार्च को फणीश्वनाथ रेणु सौ बरस के हो चुके होते | यानी रेणु के साहित्य के पाठ का न्यूनतमअर्थ इन सौ वर्षों में हुए परिवर्तन और विकास के स्तरों,रूपों का अध्ययन हो सकता है | कहना न होगा कि इतिहास वर्तमान का अतीत हुआ करता है, इस नज़र से इन सौ बरसों के भारत के अतीत का अवलोकन बताता है किऔपनिवेशिकता, स्वाधीनता और स्वातंत्र्योत्तर भारत,  शोषण के यथार्थ, स्वाधीनता के स्वप्न और संघर्ष तथा अखंड भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक  खंडता से गुजरा है |  समकाल की चिंताओं की समझ के लिए इतिहास बड़ा आधार उपलब्ध कराता है |

          भारतीयजनतंत्र के दीर्घ इतिहास के बावजूद साधारण व्यक्ति और समाज के सामने मुसीबतों का पहाड़ और सघर्षों की कठोर ज़मीन पसरी हुई है|संकट का आदर्शवादी समाधान या निराशावाद के रास्ते का चलन दोनों ही लोकतंत्र को भीतर से मजबूती की ओरनहीं  ले जाते बल्कि धीरे धीरे खोखला करते रहते हैं | सोचना होगा की रेणु की चिंताएं हमें व्यक्ति और समाज के प्रश्नोंऔर समस्याओं के समाधान की दिशा में कहाँ तक ले जाती हैं|

औपनिवेशिक भारत मेंजन्मे बिहार और मिथिलांचल केवासी फणीश्वरनाथरेणु (4मार्च1921-11अप्रैल 1977) निम्न वर्गीय व्यक्ति, भारत और नेपाल के मुक्ति संग्राम के आंदोलनकर्मी और हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार-पत्रकाररहे हैं| परिवारकी गरीबी और देश कीपराधीनता, और स्वाधीन भारत राष्ट्र में नागरिक की आज़ादी की उम्मीदों के कुचले जाने  बीच जीवन के संघर्षों और अनुभवों ने उन्हें पाला पोसा है | यही कारण है कि रेणु कीरचनाओं में गरीबी, पराधीनता और स्वाधीनता अपनी अनेक परतों के साथ मौजूद हैं, पर ज़िन्दगी के इन शूलों के साथ फूल भी हैं उनके यहाँ |परती यदि उनके समाज में मौजूद है तो परिकथा का स्वप्न, संघर्ष और कल्पना की साकारता भी परती के साथ गुंथे हुए हैं |उनका जीवन और लेखन कागज़ के फूलोंऔरकागज़ के प्रतिगामी काटों से घिरा नहीं रहा | ज़मीन और ज़मीन में जी रहे मनुष्य की चिंता और अभिव्यक्ति रेणु का जीवन और रचना स्रोत है |आंचलिकता और देसीयतावह मीन है जहां से रेणु का व्यक्ति और रचनाकार रस पाता है |

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